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Thursday, 5 February 2026

#मिलिटरी टेक्नॉलॉजी क्षेत्र में रुस की नॉर्थ कोरिया को मदत खतरा पुरी दु...

रूस और उत्तर कोरिया के बीच बढ़ती सैन्य जुगलबंदी केवल दो देशों का मिलन नहीं है, बल्कि यह ग्लोबल जियोपॉलिटिक्स (Global Geopolitics) के लिए एक 'गेम चेंजर' साबित हो रही है। पुतिन और किम जोंग-उन की यह रणनीतिक साझेदारी 2024 में हुए 'व्यापक रणनीतिक साझेदारी संधि' के बाद एक नए दौर में पहुँच गई है।

इस सहयोग के वैश्विक राजनीति और अमेरिका पर होने वाले मुख्य असर नीचे दिए गए हैं:

1. अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए सीधा खतरा

अमेरिका के लिए यह गठबंधन एक 'डबल हेडेक' (Double Headache) है।

  • टेक्नोलॉजी ट्रांसफर: रूस से मिलने वाली उन्नत तकनीक (जैसे जासूसी उपग्रह, न्यूक्लियर सबमरीन और ICBM तकनीक) उत्तर कोरिया की मिसाइलों को और अधिक सटीक बना रही है। अब उत्तर कोरिया की मिसाइलें सीधे अमेरिकी मुख्य भूमि (Mainland US) को निशाना बनाने की बेहतर क्षमता रखती हैं।
  • नया सुरक्षा समीकरण: संधि के अनुच्छेद 4 के अनुसार, यदि किसी एक देश पर हमला होता है, तो दूसरा सैन्य मदद करेगा। इसका मतलब है कि अब अमेरिका या दक्षिण कोरिया को उत्तर कोरिया से निपटने के लिए रूस की सैन्य ताकत को भी ध्यान में रखना होगा।

2. वैश्विक प्रतिबंधों का 'अंत'

उत्तर कोरिया पर दशकों से लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध अब प्रभावहीन होते दिख रहे हैं:

  • संयुक्त राष्ट्र में रूस का वीटो: रूस ने हाल ही में उत्तर कोरिया पर प्रतिबंधों की निगरानी करने वाले UN पैनल के कार्यकाल को वीटो कर दिया है।
  • सेंक्शन-मुक्त व्यापार: रूस अब उत्तर कोरिया को तेल, भोजन और तकनीक दे रहा है, जिसके बदले उसे यूक्रेन युद्ध के लिए लाखों गोले और मिसाइलें मिल रही हैं। इससे प्रतिबंधों की वह दीवार ढह गई है जिसे अमेरिका ने सालों में खड़ा किया था।

3. युद्ध का अनुभव (Combat Experience)

एक बड़ा खतरा यह भी है कि उत्तर कोरिया के हजारों सैनिक यूक्रेन में रूस की तरफ से लड़ रहे हैं।

  • इससे उत्तर कोरियाई सेना को आधुनिक युद्ध (Modern Warfare) और ड्रोन युद्ध का वास्तविक अनुभव मिल रहा है।
  • यह अनुभव कोरियाई प्रायद्वीप (Korean Peninsula) में दक्षिण कोरिया और वहां तैनात अमेरिकी सैनिकों के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है।

4. चीन की दुविधा और नई धुरी (Axis)

इस गठबंधन ने एक नई 'CRINK' (China, Russia, Iran, North Korea) धुरी को मजबूती दी है, जो पश्चिमी प्रभुत्व को चुनौती दे रही है। हालांकि, चीन इस बात से थोड़ा असहज है क्योंकि वह नहीं चाहता कि उत्तर कोरिया के कारण इस क्षेत्र में अमेरिका की सैन्य उपस्थिति और अधिक बढ़े।


भविष्य की संभावनाएँ और चुनौतियाँ

प्रभाव का क्षेत्र

परिणाम

एशिया-पैसिफिक

दक्षिण कोरिया और जापान भी अब अपनी परमाणु क्षमता बढ़ाने पर विचार कर सकते हैं।

यूक्रेन युद्ध

उत्तर कोरियाई हथियारों की सप्लाई से यह युद्ध और लंबा खिंच सकता है।

परमाणु अप्रसार

रूस द्वारा परमाणु तकनीक साझा करना वैश्विक परमाणु अप्रसार (Non-proliferation) नियमों के लिए बड़ा झटका है।

निष्कर्ष: पुतिन और किम जोंग की यह 'जुगलबंदी' अमेरिका के लिए अब तक के सबसे बड़े सुरक्षा खतरों में से एक है। यह गठबंधन केवल यूरोप (यूक्रेन) बल्कि पूरे एशिया के शक्ति संतुलन को बिगाड़ रहा है।

रूस और उत्तर कोरिया के बीच बढ़ता सैन्य और रणनीतिक सहयोग भारत के लिए एक जटिल कूटनीतिक और सुरक्षा चुनौती पेश करता है। हालाँकि भारत और रूस के संबंध ऐतिहासिक रूप से मजबूत हैं, लेकिन रूस का उत्तर कोरिया (जिसे अक्सर 'रोग स्टेट' कहा जाता है) के करीब जाना भारत के लिए कई स्तरों पर चिंता का विषय है:

1. रूस-चीन-उत्तर कोरिया-ईरान 'धुरी' (The Axis)

भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता इस नई धुरी का उभरना है।

  • चीन का प्रभाव: रूस अब अपनी सैन्य जरूरतों के लिए उत्तर कोरिया और ईरान जैसे देशों पर निर्भर हो रहा है, जो पहले से ही चीन के प्रभाव में हैं।
  • भारत की स्थिति: भारत खुद को पश्चिम (अमेरिका/यूरोप) और रूस के बीच एक 'संतुलनकर्ता' (Balancer) के रूप में देखता है। यदि रूस पूरी तरह से चीन-उत्तर कोरिया खेमे में चला जाता है, तो भारत के लिए रूस के साथ अपने "विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी" को बनाए रखना कठिन हो जाएगा।

2. परमाणु प्रसार और राष्ट्रीय सुरक्षा (Nuclear Proliferation)

भारत हमेशा से उत्तर कोरिया के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम का मुखर आलोचक रहा है।

  • पाकिस्तान कनेक्शन: भारत को डर है कि रूस से उत्तर कोरिया जाने वाली उन्नत सैन्य तकनीक (जैसे मिसाइल गाइडेंस या न्यूक्लियर सबमरीन तकनीक) अंततः पाकिस्तान तक पहुँच सकती है। उत्तर कोरिया और पाकिस्तान के बीच पहले भी परमाणु तकनीक के लेन-देन के आरोप लगते रहे हैं।
  • क्षेत्रीय अस्थिरता: रूस द्वारा उत्तर कोरिया को दी जाने वाली मदद दक्षिण एशिया और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अस्थिरता पैदा कर सकती है, जो भारत के आर्थिक और सुरक्षा हितों के खिलाफ है।

3. संयुक्त राष्ट्र (UN) और अंतरराष्ट्रीय नियम

भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के नियमों और प्रतिबंधों का सम्मान करता है।

  • प्रतिबंधों का उल्लंघन: रूस अब खुलेआम उन प्रतिबंधों का उल्लंघन कर रहा है जिन्हें उसने खुद कभी वोट दिया था। भारत के लिए यह स्थिति मुश्किल भरी है क्योंकि भारत एक 'नियम-आधारित विश्व व्यवस्था' (Rules-based world order) का समर्थन करता है।
  • कूटनीतिक दबाव: अमेरिका और उसके सहयोगी देश भारत पर दबाव डाल सकते हैं कि वह रूस के इस कदम की आलोचना करे, जिससे भारत और रूस के द्विपक्षीय संबंधों में तनाव सकता है।

4. भारत-अमेरिका संबंधों पर असर

भारत के लिए अमेरिका एक महत्वपूर्ण रक्षा और तकनीकी साझेदार है।

  • CAATSA का खतरा: यदि भारत रूस से भारी मात्रा में हथियार खरीदना जारी रखता है जबकि रूस उत्तर कोरिया के साथ गठबंधन कर रहा है, तो अमेरिकी कांग्रेस में भारत के खिलाफ सख्त रुख अपनाया जा सकता है।
  • सामरिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy): भारत अपनी विदेश नीति में स्वतंत्र रहना चाहता है, लेकिन रूस और उत्तर कोरिया की 'जुगलबंदी' भारत की इस स्वायत्तता की परीक्षा लेगी।

5. इंडो-पैसिफिक में नई चुनौतियाँ

रूस और उत्तर कोरिया के बीच हुई 'रक्षा संधि' (Mutual Defense Pact) के कारण इस क्षेत्र में नाटो (NATO) और अमेरिका की सक्रियता और बढ़ेगी। भारत नहीं चाहता कि उसके समुद्री पड़ोस (Indo-Pacific) में तनाव बढ़े, क्योंकि इससे व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।

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