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Thursday, 4 July 2019

BRIG HEMANT MAHAJAN IN HINDI VIVEK


https://hindivivek.org/author/hemant-mahajan



Saturday, 18 May 2019

पाकिस्तान अर्थव्यवस्था होगी तबाह -ब्रिगेडियर (नि) हेमंत महाजन


https://hindivivek.org/10378

पुलवामा आंतकवादी हमले के बाद भारत ने अपनी सरहदो पर आक्रमक सैन्य तैनाती बढ़ा दी है। जिसके कारण पाकिस्तान को भी उसी तरह तैनाती करना अत्यावश्यक है। जिसके चलते पाकिस्तान के अर्थव्यवस्था को रोजाना करोड़ो रूपयों का नुकसान हो रहा है। भारत के सर्जिकल स्ट्राईक 2 के बाद से पाकिस्तान की प्रवासी एवं व्यापारीक विमान यात्रा गत सप्ताह से पूरी तरह बंद की गई है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय का भरोसा पाकिस्तान पर से पुरी तरह उठता जा रहा है।
एैसे ही सैन्य तैनाती लंबे समय तक जारी रखने पर पाकिस्तान में महंगाई धरम पर पहुँच जाएगी और आतंरिक अशांति बढ़ती जाएगी। एक समय एैसा आएगा कि सेना भी सामाजिक विद्रोह को संभाल नही पाएंगी।
वर्तमान समय में पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था बहुत ही खराब स्थिति में है। सरकारी पगार देने के लिए इमशन खान को विश्व भर के सामने हाथ फैलाकर पैसे लाने पड़ रहे है। अमेरिकी आर्थिक सहायता कब की बंद हो चुकी है। और सिपेक के लिए लिया गया चीन से कर्ज पाकिस्तान के गले तक आ गया है। अरब देशो ने दिया हुआ कर्ज पाकिस्तान को आर्थिक सर्वनाश से बाहर निकालने में अनुपयोगी है।
* अफगाणिस्तान और ईरान सीमा से पाकिस्तानी सैन्य भारतीय सीमा पर
भारतीय सेना की तैनाती शुरू होते ही पाकिस्तान ने बलुचिस्तान और पश्तुन क्षेत्र से जल्दबाजी में सेना की हलचल शुरू कर दी है। अभी अफगाणिस्तान एवं ईरान सीमा से हटाकर पाकिस्तानी सेना को भारतीय सीमा पर लाया जा रहा है। इसलिए बलुच संगठनो द्वारा पाकिस्तानी सेना पर हमला बढ़ता जा रहा है। इसके साथ ही सेना से रिक्त हुए 200 के करीब पाकिस्तानी चौकियों पर बलुच योध्दाओं ने अपना कब्जा जमा लिया है। बीते एक माह में बलुच हमलों में 150 से अधिक पाकिस्तानी सैनिक मारे गए है।
भारत की आक्रामक सैन्य तैनाती लंबे समय तक पाकिस्तान सीमा पर डटी रही तो पाकिस्तान अर्थव्यवस्था पाताल लोक में चली जाएगी और बलुच, सिंधी, मुहाजीर स्वतंत्रता आंदोलन को बहुत अधिक बल मिलेगा। “वॉर ऑफ ऍट्रीशन” स्वतंत्र बलुचिस्तान, सिंधु देश और मुहाजिर राष्ट्र निर्माण करने के लिए अनुकूल वातावरण तैयार कर के देगा।
* पाकिस्तान में महंगाई चरम पर
आतंकवादियों को खाद-पानी देनेवाले पाकिस्तान को भारत ने सीमा शुल्क 200 फीसदी बढ़ा कर और ‘मोस्ट फेण्हर्ड नेशन’ का दर्जा छिनकर जोरदार झटका दिया है। जिसके कारण पहले से ही आर्थिक रूप से कमजोर पाकिस्तान में महंगाई चरम पर पहुंच गई है। पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अकेला पड़ चुका है और इसका दुष्प्रभाव उसके जर्जर अर्थव्यवस्था से भी दिखाई दे रहा है। वर्तमान परिस्थिति एैसी है कि पाकिस्तान में महंगाई आकाश छुने को बेताव है। नए आकड़े के अनुसार इन्फलेशन रेट सतत बढ़ता जा रहा है। फरवरी 2019 में इसी दर से गत 5 वर्षो में उच्चतम स्तर को स्पर्श किया है।
फरवरी 2019 में महंगाई दर 56 महिनो के उच्चतम स्तर 8.21 फीसदी पर पहुंच गया। इतने बड़े पैमाने पर महंगाई के उछाल से लगभग सभी क्षेत्रो में बड़ी हुई किमतो से जीवन जीने के लिए खर्च में अधिक बढ़ोत्तरी होने के संकेत दे रहा है। पाकिस्तान के सांख्यिकी विभाग ने 1 मार्च को जाहिर किया कि ग्राहक मूल्य निर्देशांक द्वारा (सीपीआय-कंझ्युमर प्राईस इंडेक्स) मापने पर महंगाई में फरवरी 2019 में बढ़कर 8.21 फीसदी हो गई जबकि बीते वर्ष 3.8 फीसदी स्तर पर थी। बीते कुछ समय से पाकिस्तानी रूपयों का बड़े पैमाने पर अवमूल्यन हुआ है। गत 1 वर्षो में पाकिस्तानी रूपया डॉलर की तुलना में 33 फीसदी नीचे गिर गया। रूपयो के नीचले स्तर का दुष्प्रभाव पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार पर भी पड़ा और उसमें कमी आ गई है। परिणाम स्वरूप पाकिस्तान खर्च के असंतुलन (इरश्ररपलश ेष झरूाशपीं) बड़े संकट की ओर अग्रसर होता जा रहा है।
रोजाना भोजन में शामिल टमाटर, अदरक, आलु, बीफ, शक्कर, चाय, मटन, गुड़, घी, मछली, मुंग दाल, अंडा, खाद्य तेल, चावल, हरीभरी दाल, ताजा दुध और गेहुं के दाम में 3.21 फीसदी रही। फरवरी 2019 में यह दर करीबन 6 वर्षो के उच्चतम स्तर 8.8 फीसदी पहुंच गई। मुद्रास्फीति का प्रभाव सरकार के नीतियों पर भी पड़ता दिखाई दे रहा है। मुद्रास्फीति के बढ़ते दर से अनुमान लगाया जा रहा है कि पाकिस्तान सरकार के सभी सरकारी कर्मचारियों के वेतन में 10 फीसदी बढ़ोत्तरी करने के सिनेट के प्रस्ताव को नामंजुर किया जा सकता है। इसका मुख्य कारण पाक के राजकोष की स्थिति दयनीय होना बताया जा रहा है।
* भविष्य की संभावनाएं
एशियाई विकास बैंक के आकड़े अनुसार पाकिस्तान की जीडीपी विकास दर वर्तमान समय में4.8 फीसदी है, जो नेपाल से भी (5.5 फीसदी) कम है। पाकिस्तान के नए जीडीपी आकड़े अनुसार 2017 में 4.4 फीसदी और 2018 में 5.8 फीसदी लुड़क गया। ‘स्टँर्ड एण्ड पुअर्स’ ने भी पाकिस्तान के दिर्घकालीन कर्म मानक को ‘बी-नेगेटीव’ रेटिंग देकर नीचे ला दिया है। इसके साथ ही एैसा संकेत दिया है कि संकेत दिया है कि 2019 में पाकिस्तान की जीडीपी दर 4 फीसदी से भी नीचे जा सकती है। आगामी 2 वर्षो में 3.5 फीसदी और 2022 तक 3.3 फीसदी स्तर तक जाएगी। आज के समय में पाकिस्तान की मुद्रास्फीति भारत, बांग्लादेश और नेपाल सहित भारतीय उपखंड में सर्वाधिक है। विदेशी मुद्रा भंडार में कथित रूप से 7 बिलियन डॉलर तक कभी आई है। जिससे पाकिस्तान केवल एक माह तक आयात कर सकता है। जून 2019 को समाप्त होनेवाले आर्थिक वर्ष में पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में आ सकती है। अभी पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था 2 प्रकार की चुनौतियों का सामना कर रही है। पहला है कि सरकारी खर्च तिजोरी के पैसे से अधिक है, जिससे प्रतिवर्ष 2 खरब रूपयों का नुकसान हो रहा है वही दुसरी ओर पाकिस्तान का आयात निर्यात से दोगुना है। बढ़ती मुद्रास्फीति से संबंधित नुकसान उच्च वास्तविक आर्थिक विकास के मार्ग पर पाकिस्तान को निकट समय में बड़े संकट में डाल सकता है।
* पाकिस्तान के खिलाफ आर्थिक युध्द
भारत को अब पाकिस्तान के खिलाफ आर्थिक युध्द शुरू करना चाहिए। शस्त्र स्पर्धा में उलझा कर अमेरिका ने जिस तरह रूस को परास्त किया, उसी तरह हमें भी पाकिस्तान को आर्थिक विनाश की ओर ले जाना चाहिए। होर्मुझ और एडन की खाड़ी में भारतीय नौसेना की तैनाती स्थायी रूप से की जानी चाहिए। इसके चलते पाकिस्तानी नौसेना को भी अतिरिक्त शस्त्रास्त्र की तैनाती करनी पड़ेगी। इसके कारण पहले से ही असमर्थ पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था और अधिक प्रभावित होगी। हमें अपनी आर्थिक सामर्थ्य के बुते पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था को पुरी तरह से तबाह कर देना चाहिए। भारतीय अर्थव्यवस्था पाकिस्तान के अर्थव्यवस्था से 15 गुणा अधिक बड़ी है। यदि हम पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था तबाह नही कर पाए तो हमारे सामर्थ्य का क्या उपयोग? हम निम्नलिखित उपाय कर सकते है क्या?
1) 500/1000 रूपये के फर्जी पाकिस्तानी नोट को पाकिस्तान में घुसा सकते है क्या? जैसे पाकिस्तान हमारे देश में करता है तो हम क्यों नही कर सकते?
2) भारतीय सस्ती वस्तुओं से पाकिस्तान का बाजार भर सकते है क्या? और उसके साथ ही उनके उद्योग को ध्वस्त कर सकते है क्या? इसके लिए पहले से ही सस्ती चीन की वस्तुओं को तस्करी द्वारा पाकिस्तान में निर्यात कर योजना को सफल बनाया जा सकता है। अफगाणिस्तान/पाकिस्तान के अफीम की खेती पर प्रतिबंध कैसे लगाया जा सकता है? इस पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
3) हम एफआयआय ((foreign Institutional Investors) एनआरआय एवं अन्य उपायों से कराची के स्टोक एक्सचेंज को गिरा सकते है क्या?
4) पाकिस्तान की ओर जानेवाली नदियों का उद्गाम भारत में है। धुम-धमाका न करते हुए पानी का नियोजन इस तरह से करे कि गर्मी के मौसम में कम और बारीस के मौसम में अधिक पानी छोड़ा जा सके, जैसे चीन ब्रहम्पुत्र का पानी छोड़ता है, उसी तरह हमे भी नदियों को अपने नियंत्रण में लेकर पानी को छोड़ना चाहिए।

* और क्या करे?
आज की स्थिति में भारत को बड़ा सैकि संघर्ष स्वयं शुरू न करते हुए और अभी की आक्रामक सैन्य तैनाती को जरा भी कम न करते हुए पाकिस्तान पर प्राणघातक सैन्य दबाव स्थाई रूप से बनाए रखना चाहिए। जिससे पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था धरासाई हो जाए और बलुच, पश्तुन, सिंधी, मुहाजीर ये सभी अपने राष्ट्रवादी आंदोलनो को नई धार दे सके।
अफगाणिस्तान में रक्तरंजित तालिबान, आतंकवाद और कश्मीर में रक्तपात इसका मुल उद्गम पाकिस्तान के भीतर गहराई तक बसा हुआ है। इसलिए पाकिस्तान को पुर्णरूप से खंडित किए बिना आतंकवाद को नही रोका जा सकता।

Wednesday, 15 May 2019

शहरी माओवाद, वर्तमान परिस्थिति एवं उपाय योजना मई 9, ब्रिगेडियर (नि) हेमंत महाजन

माओवादी संगठनों से जुड़े कवि वरवरा राव की जमानत याचिका 29 अप्रैल  को कोर्ट ने खारिज कर दी। यदि सब को जमानत दी गई तो वे भूमिगत हो सकते हैं। राव प्रतिबंधित संगठन सीपीआई (माओवादी) के वरिष्ठ तथा सक्रिय सदस्य हैं। वर्तमान में वे अत्यंत गंभीर तथा देशद्रोह के आरोप में न्यायालयीन अभिरक्षा में जेल में बंद हैं।
सत्य की खोज में एवं अपनी पुस्तक के संदर्भ में मैं माओवादियों के संपर्क में था, ऐसी स्वीकारोक्ति 15 अप्रैल को माओवाद समर्थक गौतम नवलखा द्वारा न्यायालय में दी गई। माओवादी एवं सरकार के बीच मध्यस्थ की भूमिका गौतम नवलखा द्वारा निभाई गई थी, ऐसे व्यक्ति पर माओवाद को बढ़ावा देने का आरोप कैसे लग सकता है? ऐसा सवाल उनके वकील द्वारा पूछा गया था।
माओवाद समर्थकों के वकीलों द्वारा किया गया इस प्रकार का दावा क्या ठीक है? हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि माओवादी संगठनों पर देश में अनेक वर्षों से प्रतिबंध हैं। ऐसे प्रतिबंधित संगठनों से कोई भी भारतीय संपर्क रख सकता है क्या? यह कार्य देशद्रोह की श्रेणी में है या नही?
*भटके हुए बुद्धिजीवी, मानवाधिकार संस्थांओं का दुष्प्रचार एवं शहरी माओवादी
संविधान आधारित भारतीय लोकतंत्र को उद्ध्वस्त कर माओवाद को प्रस्थापित करना, यह माओवादियों का लक्ष्य है। माओवाद कोई राजनीतिक आंदोलन नही है क्योंकि हमारी व्यवस्था में हिंसा को स्थान नही है। परंतु माओवादी समर्थक शहरी बुद्धिजीवियों की ओर से उनका जानबूझकर समर्थन किया जाता है एवं आपरेशन “ग्रीन हंट” रोककर उनसे वार्ता की जाये, इस तरह की मांग की जाती है। ये बुद्धिजीवी दबावतंत्र का उपयोग करते हैं। समाचार पत्र, सामाजिक संस्था, विश्वविद्यालयों इ. का उपयोग कर समाज में वैचारिक भ्रम फैलाना इनकी कार्यशैली का अंग है। इस तरह ये बुद्धिजीवी निरपराध आदिवासियों की हत्या में भी शामिल हैं। समाज इन बुद्धिजीवियों को बड़ा लेखक, पत्रकार, एवं विचारशील व्यक्ति के रूप में बहुत आदर देता है परंतु ये मानवतावादी कहलाने वाले देश का बहुत बड़ा नुकसान कर रहे हैं। माओवादियों द्वारा निर्दोष आदिवासियों की हत्या पर उनकी लेखनी हमेशा खामोश रहती है। इन लोगों के पीछे पाकिस्तान, चीन और अनेक भारतविरोधी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं का हाथ है। सारांश माओवादियों की क्रूरता को ये लोग प्रोत्साहन देने का काम कर रहे हैं। इन बुद्धिजीवियों की अगली पीढ़ी अर्थात उनके लड़के-बच्चे कभी भी इन लड़ाइयों में शामिल नही होते है। वे अक्सर या तो अमेरिका या विदेश के अन्य देशों में काम कर रहे होते हैं या पढ़े रहे होते हैं।
*जंगल के सशस्त्र माओवादियों की अपेक्षा शहरी माओवादी ज्यादा खतरनाक
देश के दुर्गम भागों, जंगलों में चल रही माओवादियों की कुटिल कार्रवाईयों को शहरी बुद्धिजीवी वैचारिक आधार देने का काम करते हैं। यही शहरी माओवाद कहलाता है। जंगल के सशस्त्र माओवादियों की अपेक्षा ये शहरी माओवादी ज्यादा खतरनाक हैं। सरकार पर दबाव डालने हेतु, उपचार हेतु सहायता, अर्थ व्यवस्थापन, मीडिया का ध्यान आकर्षित करने हेतु, विदेशों से संपर्क के लिए माओवादियों का शहर से होने वाला यह संपर्क उपयोगी रहता है। माओवादियों के समर्थन में विविध पोस्ट लिखी जाती हैं। इन सबका समाज पर विशेषकर नौजवानों पर अलग प्रभाव पड़ता है। माओवादियों की ओर से दलितों का गलत उपयोग किया जाता है।
  • सीपीआई (माओइस्ट) अर्बन परस्पेक्टिव्ह
साधारणत: 2001 के आसपास से माओवादियों ने अपने पैर शहरों की ओर फैलाना प्रारंभ किया। माओवादी नेता कोबाड घँडी के व्यापक संपर्क के कारण “अर्बन परस्पेक्टिव्ह” शीर्षक से एक दस्ताऐवज तैयार किया गया। ग्रामीण भाग के सशस्त्र संघर्ष को शहरों से समर्थन दिलाने के काम की रणनीति का खुलासा इस दस्ताऐवज में सार्वजनिक रूप से किया गया। आदिवासी इलाकों में चलाएं जाने वाले सशस्त्र संघर्ष को मानव बल के साथ-साथ सामग्री, गुप्त कार्रवाई हेतु आश्रय स्थान, हिंसक घटनाओं में जख्मी होने वालों के लिए उपचार व्यवस्था इ. काम नगरी माओवादियों के गुटों की ओर दिये जाते हैं। शहरों मे जो काम किए जाने हैं उनमें “शत्रु संगठनों में प्रवेश करने का काम” भी अधिकृत रूप से शामिल है। माओवादियों के शहरी समर्थक सोशल मीडिया का भी प्रभावी उपयोग करते देखे जा सकते हैं। भीमा-कोरेगांव की घटना में जिन पांच नेताओं को गिरफ्तार किया गया, उसके विरोध में अमेरिका, स्पेन, केन्या, इंडोनेशिया, जर्मनी, नॉर्वे इ. देशों से किए गए ट्वीट यह दर्शाते हैं कि नगरी माओवादियों के अंतर्राष्ट्रीय संबध कितने फैले हुए एवं मजबूत हैं। सामान्य लोगों को क्रांति के लिये प्रोत्साहित करना एवं इस काम को मजदूर, अर्धकुशल मजदूर, विद्यार्थी, मध्यमवर्गीय नौकरीपेशा वर्ग एवं बुद्धिजीवी इनके माध्यम से पूर्ण कराना यह इनका मुख्य काम है।
  • पांच–छह लोगों को पकड़ना याने बड़े पर्वत के शिखर
बहुत पहले से माओवादियों ने शहरी भागों में अपनी जड़ें फैलाई हैं। कुछ नेताओं की गिरफ्तारी से समाज में फैले ये विषाणु समाप्त हो गये हैं ऐसा समझना भूल है। क्योंकि ये पांच–छह तो इस पर्वत के शिखर मात्र हैं। अभी भी प्रकाश में न आए हुए तथा पुलिस की पकड़ से बाहर सैकड़ो की संख्या में ये शहरी माओवादी हमारे आसपास घुम रहे होंगे। उन पर कार्रवाई कब होगी? इन शहरी माओवादियों को जड़ से उखाड़ फेंकना होगा। पुलिस ने यह काम शुरू किया है परंतु उनके लिए भी यह उतना सहज साध्य नही है।
माओवादियों की तुलना में शासक की सशस्त्र शक्ति अधिक है, फिर भी इस समस्या का समाधान नही हो रहा है। समस्या के मूल में जाने से यह दिखता है कि संख्या में भले ही कम हो फिर भी माओवादी अपने “ध्येय” से प्रेरित हैं जबकि  हम नही।
  • क्या करें-कौन करें!
माओवाद से संबंधित व्यक्ति एवं संगठनों पर कानूनी कार्रवाई आवश्यक है। सभी राज्य सरकारों द्वारा इन पर कार्रवाई अपेक्षित है। राजनीतिक दलों को यह समझाना अत्यावश्यक है कि माओवादियों का उद्देश समाज में अराजकता मचाना है। इसे रोकने के लिए सभी राजनीतिक दलों को कठोर भूमिका अपनानी होगी। विदेश से उनके लिए आने वाले पैसे पर प्रतिबंध लगाना होगा। छात्रावास, विश्वविद्यालय, शैक्षणिक संस्थाए, महाविद्यालय के युवाओं में माओवादी गतिविधियों में शामिल होने हेतु बरगलाया जाता है। इससे युवाओं को दूर रखने के लिए उनका उद्बोधन आवश्यक है। झोपड़ियों में रहने वाले लोगों के संगठन, मजदूर इ. को समझाना आवश्यक है। शहरी माओवादियों को जड़ से उखाड़ फेंकना आवश्यक है।
     माओग्रस्त क्षेत्रों से जातीयवाद, उंच-नीच का भेद मिटाकर देशभक्ति, राष्ट्रीय शिक्षा एवं चरित्र तथा लोकतंत्र की जड़े मजबूत करना आवश्यक है।
     माओग्रस्त क्षेत्रों से बेरोजगारी दूर करना जिससे बेरोजगार युवक माओवाद की ओर अग्रसर ना हों।
     शहरों से माओग्रस्त क्षेत्रों में जानेवाले व्यक्तियों एवं संगठनों की निगरानी आवश्यक है।
     बढ़ते शहरीकरण के कारण शहरों में आने वाले अलग-अलग वर्ग के लोगों को मार्गदर्शन देकर माओवादी प्रभाव में जाने से रोकना होगा।
     सभी संदिग्ध व्यक्तियों का संपूर्ण डाटा सरकार एवं सुरक्षा एजेन्सियों के पास होना आवश्यक है।
     समाज में नुक्कड़ नाटक, सभा, पोस्टरों एवं अन्य साधनों द्वारा माओवाद के विरूद्ध जन-जागृती आवश्यक है।
     समाज के वंचित वर्ग के लोगों से सतत चर्चा जिससे वे कुमार्ग की ओर न बढ़े। समाज में सर्वधर्म समभाव की भावना निर्माण करना आवश्यक है।
     माओवाद के मार्ग पर बढ़ने वाले युवकों की निगरानी एवं वहां जाने से पूर्व ही उनका मार्गदर्शन कर उन्हे उस मार्ग पर जाने से रोकना होगा।
  • शासन एवं माओग्रस्त क्षेत्रों में दूरी कम एवं सुसंवाद बढ़ाना
     माओवादी कार्रवाई करने वाले और उन्हे सहायता देने वालों पर कठोर कार्रवाई करना। माओवादियों की हलचल पर नजर रखने हेतु गुप्तचर संगठन स्थापित करना।
     माओवादियों की जानकारी देने वालों को पुरस्कृत करना।
     दुर्गम इलाकों में काम करने वाले उद्योगपतियों पर ध्यान रखना क्योंकि इनमें से अनेक माओवादियों को पैसा देते हैं।
     माओग्रस्त क्षेत्रों से बाहर आनेवाली एवं इस भाग में जाने वाली सभी गाड़ियों की अनिवार्य चेकिंग जिससे अवांछित सामान आ जा न सके एवं संदिग्ध व्यक्तियों की गिरफ्तारी हो सके।
     सोशल मीडिया पर पैनी निगाह रखकर माओवाद की ओर मुड़ने वाले युवकों को पहले ही रोकना।
     उपरोक्त दिए हुए उपायों के अतिरिक्त भी अन्य अनेक उपाय अमल में लाए जा सकते हैं। इन उपायों पर सतत् चर्चा कर और अच्छे नए उपाय खोजें जा सकते हैं।
शहरी माओवादी समाज में अपना प्रभाव बढ़ाने हेतु अलग-अलग प्रकार की  कार्रवाईयां करते हैं। इनकी निगरानी कर उन्हे योग्य उत्तर देने हेतु उपाय करना आवश्यक है। हमें माओवादियों से एक कदम आगे रहने की आवश्यकता है, तभी हम उनका बढ़ता हुआ प्रभाव रोक पाएंगे ।