क्या ईरान “आतंकी साज़िश” का कार्ड खेलकर मामला मोड़ रहा है?
- ईरानी
हुकूमत की बयानबाज़ी का पैटर्न ऐसा है कि वह प्रदर्शनकारियों को अक्सर “दंगेबाज़, विदेशी एजेंट, आतंकवादी” कहती है, ताकि सख़्त दमन, इंटरनेट ब्लैकआउट और भारी बल प्रयोग को वैध ठहराया जा सके। मौजूदा दौर में भी “टेररिस्ट वॉर”, “आईएसआईएस स्टाइल” जैसे शब्द बारी‑बारी से इस्तेमाल हो रहे हैं।
- मानवाधिकार
समूहों और स्वतंत्र मीडिया की रिपोर्टों में भारी गोलीबारी, सैकड़ों मौतें, अस्पतालों पर छापे, इंटरनेट बंदी आदि की बात आ रही है – यानी “आतंकी खतरा” वाला नैरेटिव हुकूमत के लिए एक तरह का राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक हथियार भी है, जिससे घरेलू विरोध को डेलीजीटिमाइज़ किया जा सके और अंतरराष्ट्रीय आलोचना को “सिक्योरिटी फाइट” के नाम पर धुंधला किया जा सके।
इसलिए, बहुत संभव है कि:
- कुछ
हथियारबंद/उग्र तत्व सचमुच हिंसा कर रहे हों,
- लेकिन
राज्य इन घटनाओं का उपयोग पूरे आंदोलन को “टेरर वॉर” घोषित करने और अपने दमन को जायज़ ठहराने के लिए भी कर रहा हो।
सार
- हिंसा,
गोलीबारी और कुछ संगठित हथियारबंद गतिविधियाँ ज़रूर दिख रही हैं, पर “पूरी तरह आईएसआईएस‑स्टाइल आतंकी कत्लेआम” वाला चित्र अभी एकतरफा सरकारी नैरेटिव ज़्यादा है, स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्य कम।
- विरोध
की जड़ें आर्थिक‑राजनीतिक असंतोष में हैं; आतंकी/हिंसक गुटों की संभावित घुसपैठ को पूरी कहानी मानना भी ग़लत होगा, और उसे पूरी तरह नकारना भी।
- “आतंकी
साज़िश” का कार्ड ईरान की सत्ता के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक पैंतरा भी है, जिससे अंतरराष्ट्रीय दबाव और घरेलू आलोचना, दोनों को सिक्योरिटी नैरेटिव में ढालकर मोड़ने की कोशिश हो रही है।
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