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Sunday, 18 January 2026

1.चीनी आर्थिक युद्ध को कैसे परिभाषित किया जाता है?चीन आर्थिक युद्ध में भारत को निशाने पर क्यों ले रहा है.? 2. आर्थिक युद्ध में किन-किन आर्थिक हथियारों का इस्तेमाल भारत के खिलाफ कर रहा है? 3. TRADE DEFICIT भारत चीन संबंध में कितना सबसे बड़ा खतरा बन चुका है.? 4.क्या चीनभारत के पड़ोसी देशों को DEBT में फंसा कर भारत को घर या एन्सर्किल कर रहा है?

 भारत और चीन के बीच चल रहे आर्थिक तनाव को समझना सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

1. चीनी आर्थिक युद्ध की परिभाषा और भारत को निशाना बनाने के कारण

चीनी आर्थिक युद्ध को अक्सर "आर्थिक जबरदस्ती" (Economic Coercion) के रूप में परिभाषित किया जाता है। इसमें चीन अपनी विशाल अर्थव्यवस्था और वैश्विक सप्लाई चेन पर अपने नियंत्रण का उपयोग दूसरे देशों की राजनीतिक और रणनीतिक नीतियों को प्रभावित करने के लिए करता है।

चीन भारत को निशाना क्यों बना रहा है?

  • क्षेत्रीय प्रभुत्व: चीन एशिया में खुद को एकमात्र महाशक्ति के रूप में देखना चाहता है और भारत को अपना सबसे बड़ा प्रतिस्पर्धी मानता है।
  • सीमा विवाद: वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर तनाव के समय चीन आर्थिक दबाव के जरिए भारत को झुकने पर मजबूर करने की कोशिश करता है।
  • वैश्विक गठबंधन: भारत के बढ़ते वैश्विक कद और अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया के साथ (QUAD जैसे समूहों के माध्यम से) बढ़ती नजदीकी को चीन अपने लिए खतरा मानता है।

2. भारत के खिलाफ इस्तेमाल किए जाने वाले आर्थिक हथियार

चीन भारत के खिलाफ कई प्रकार के "आर्थिक हथियारों" का प्रयोग करता है:

  • सप्लाई चेन पर नियंत्रण: भारत अपनी दवा उद्योग (API), इलेक्ट्रॉनिक्स और सौर ऊर्जा के लिए कच्चे माल हेतु चीन पर निर्भर है। चीन इस आपूर्ति को रोककर या महंगा करके भारतीय उद्योगों को बाधित कर सकता है।
  • साइबर हमले: भारत के पावर ग्रिड और बैंकिंग सिस्टम जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर साइबर हमले करना भी आर्थिक युद्ध का एक हिस्सा है।
  • बाजार तक पहुंच रोकना: भारतीय कृषि उत्पादों और आईटी सेवाओं को चीनी बाजार में प्रवेश करने में जानबूझकर तकनीकी बाधाएं (Non-tariff barriers) पैदा करना।
  • डंपिंग (Dumping): भारतीय बाजारों में बहुत सस्ते दाम पर चीनी सामान भरकर स्थानीय छोटे और मध्यम उद्योगों (MSME) को बर्बाद करना।

3. व्यापार घाटा (Trade Deficit): एक बड़ा खतर

भारत और चीन के बीच व्यापार घाटा एक गंभीर सुरक्षा और आर्थिक चिंता का विषय बन चुका है।

  • असंतुलन: भारत चीन से बहुत अधिक आयात करता है (मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, रसायन), जबकि चीन को बहुत कम निर्यात कर पाता है। यह घाटा सालाना लगभग $80 बिलियन से $100 बिलियन के बीच रहता है।
  • खतरा क्यों है?:
    1. पूंजी का पलायन: भारत का पैसा चीन की अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहा है, जिसे वह अंततः अपनी सेना (PLA) के आधुनिकीकरण पर खर्च करता है।
    2. निर्भरता: अत्यधिक निर्भरता के कारण युद्ध जैसी स्थिति में चीन भारत की आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई काटकर संकट पैदा कर सकता है।
    3. स्थानीय उद्योगों का नुकसान: चीनी आयात के कारण भारत के 'मेक इन इंडिया' अभियान को कड़ी चुनौती मिलती है।

4. 'कर्ज का जाल' (Debt Trap) और भारत की घेराबंदी

जी हां, चीन की 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' (String of Pearls) नीति के तहत भारत के पड़ोसी देशों को कर्ज में फंसाकर उन्हें भारत के खिलाफ इस्तेमाल करने की रणनीति स्पष्ट दिखती है:

  • श्रीलंका: हंबनटोटा बंदरगाह को कर्ज चुका पाने के कारण चीन ने 99 साल की लीज पर ले लिया है, जिसका उपयोग सैन्य उद्देश्यों के लिए हो सकता है।
  • पाकिस्तान: CPEC (चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा) के जरिए पाकिस्तान चीन पर पूरी तरह निर्भर हो गया है, जिससे चीन को अरब सागर तक सीधी पहुंच मिल गई है।
  • नेपाल और मालदीव: इन देशों में बुनियादी ढांचे के नाम पर भारी निवेश करके चीन वहां की राजनीति को भारत के खिलाफ प्रभावित करने का प्रयास करता है।
  • एन्सर्किलमेंट (घेराबंदी): इन देशों में बंदरगाहों और हवाई पट्टियों का निर्माण करके चीन भारत को चारों तरफ से घेरने (Encirclement) की कोशिश कर रहा है ताकि हिंद महासागर में भारत के प्रभाव को कम किया जा सके।

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