आपकी
चिंता वाजिब है: पश्चिम एशिया
के लंबे संघर्ष ने
अमेरिका के कुछ उच्च-स्तरीय गोला-बारूद, खासकर
महंगे मिसाइल इंटरसेप्टर और लंबी दूरी
की स्टैंड-ऑफ मिसाइलों, पर
दबाव बढ़ाया है। हालिया रिपोर्टों
में JASSM-ER, Patriot और THAAD जैसी श्रेणियों में
स्टॉक और उत्पादन-क्षमता
पर तनाव का संकेत
दिया गया है, लेकिन
पेंटागन अब भी अपनी
तत्परता बनाए रखने की
बात कह रहा है
�.
1) अगर
चीन अभी ताइवान पर
हमला करे तो क्या
होगा
सबसे पहले, यह एक तुरंत
क्षेत्रीय संकट होगा, न
कि सिर्फ ताइवान बनाम चीन का
युद्ध। अमेरिका, जापान, फिलीपींस और अन्य साझेदार
ताइवान स्ट्रेट और पहली द्वीप-श्रृंखला के आसपास अपनी
सैन्य उपस्थिति और अभ्यास पहले
से बढ़ा रहे हैं,
इसलिए शुरुआती घंटों में ही मिसाइल,
वायु-रक्षा, समुद्री-निगरानी और साइबर गतिविधि
बहुत तेज़ हो जाएगी
�.
ताइवान अकेला नहीं है: उसके
पास अमेरिका-समर्थित हथियार प्रणालियाँ, रिज़र्व बल और असमान
युद्ध (asymmetric
defense) की योजना है, इसलिए चीन
के लिए यह “तेज़
जीत” वाला युद्ध नहीं
रहेगा �.
2) अमेरिका
क्या करेगा
अमेरिका सीधे युद्ध में
प्रवेश करेगा या नहीं, यह
उस समय की राजनीतिक-रणनीतिक स्थिति पर निर्भर करेगा,
लेकिन मजबूत सैन्य प्रतिक्रिया लगभग निश्चित होगी।
उसमें खुफिया समर्थन, एअर और समुद्री
समर्थन, जापान/फिलीपींस के साथ समन्वय,
और चीनी आक्रामकता को
रोकने के लिए बल-प्रदर्शन शामिल हो सकता है
�.
अमेरिका की 2026 रक्षा-रणनीति में चीन को
Indo-Pacific में रोकना और सहयोगियों के
साथ burden-sharing बढ़ाना प्रमुख लक्ष्य हैं �.
3) क्या
अमेरिका दो मोर्चों पर
युद्ध लड़ पाएगा
हाँ, लेकिन सीमित रूप में और
बिना भारी दबाव के
नहीं। अमेरिका के पास अभी
भी दुनिया की सबसे बड़ी
संयुक्त सैन्य-औद्योगिक क्षमता, सहयोगी नेटवर्क और वैश्विक तैनाती-सामर्थ्य है, इसलिए वह
एक साथ दो बड़े
संकटों को संभाल सकता
है; लेकिन क्षमता “असीमित” नहीं है �.
नौसेना के आकार, गोला-बारूद भंडार, और उत्पादन-गति
जैसी सीमाएँ इसे कठिन बनाती
हैं, खासकर तब जब एक
युद्ध में पहले से
उच्च मात्रा में मिसाइलें खर्च
हो चुकी हों �.
4) असली
बाधा क्या होगी
असली समस्या “सिर्फ जहाज़ या विमान” नहीं,
बल्कि गोला-बारूद की
खपत दर है। हालिया
रिपोर्टों में बताया गया
है कि अमेरिका ने
पश्चिम एशिया में बड़ी मात्रा
में precision
munitions खर्च की हैं, और
Patriot/THAAD/JASSM जैसी
प्रणालियों के उत्पादन को
बढ़ाने की कोशिशें चल
रही हैं �.
इसका मतलब यह है
कि यदि चीन-ताइवान
संकट अचानक भड़कता है, तो अमेरिका
के लिए शुरुआती चरण
में शक्ति-प्रदर्शन संभव होगा, लेकिन
लंबे समय तक उच्च-तीव्रता वाला दो-फ्रंट
युद्ध दबाव पैदा करेगा
�.
ताइवान पर हमला हुआ तो अमेरिका और उसके सहयोगी तुरंत रोकने की कोशिश करेंगे, और चीन को तेज़ जीत मिलने की संभावना कम होगी �.
अमेरिका दो मोर्चों पर लड़ सकता है, लेकिन यह “आराम से” नहीं, बल्कि हथियार-भंडार, उत्पादन और गठबंधन-समर्थन की कीमत पर होगा �.
पश्चिम एशिया की खपत ने अमेरिका की रणनीतिक मारक क्षमता को कुछ हद तक चुभन दी है, पर उसे निष्क्रिय नहीं किया है �.
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