राष्ट्रीय हित से ऊपर व्यक्तिगत जुनून
पुस्तक Regime Change: Inside the Imperial Presidency of Donald Trump का तर्क है कि ट्रम्प का दूसरा कार्यकाल राष्ट्रीय हित से कम और व्यक्तिगत शक्ति के जुनून से अधिक प्रेरित था। परिणामस्वरूप, अमेरिका एक साथ दो युद्धों में उलझ गया — ईरान के साथ सैन्य संघर्ष और दुनिया के अधिकांश देशों के साथ आर्थिक टैरिफ युद्ध।
चापलूसी बनी नीति का ईंधन
ट्रम्प ने स्वयं की तुलना चंगेज़ ख़ान, नेपोलियन, हिटलर, स्टालिन और माओ से की, यह दावा करते हुए कि वह उनसे अधिक शक्तिशाली हैं। यह नोट किसी इतिहासकार ने नहीं बल्कि एक गोल्फ कैडी ने लिखा था, जो दर्शाता है कि विशेषज्ञता को दरकिनार कर चापलूसी को नीति का आधार बना दिया गया था।
टैरिफ युद्ध: तथ्य बनाम भावनाएँ
ट्रम्प का मानना था कि चीन और भारत अमेरिका को “150–200%” और “175%” टैरिफ से लूट रहे हैं। जब अधिकारियों ने वास्तविक आँकड़े प्रस्तुत किए, तो उन्होंने उन्हें “बकवास” कहकर खारिज कर दिया। यह दिखाता है कि उन्हें ऐसे तथ्य चाहिए थे जो उनकी मान्यताओं की पुष्टि करें।
“मैं जिम्मेदारी लूँगा” – शासन की सोच
वाणिज्य सचिव हावर्ड लुटनिक ने चेतावनी दी कि बाज़ार ध्वस्त हो सकते हैं, लेकिन ट्रम्प का जवाब था: “ठीक है, मैं जिम्मेदारी लूँगा। तो क्या?” यह उनके शासन का मूल दर्शन था: सबूत वैकल्पिक थे, राष्ट्रपति की निश्चितता ही पर्याप्त थी।
नेतन्याहू का प्रभाव और चापलूसी
इज़राइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने ट्रम्प के साथ संबंध सुधारने के लिए अत्यधिक चापलूसी की। उन्होंने ट्रम्प को एक सोने से मढ़ा हुआ पेजर भेंट किया, जो इज़राइल के गुप्त अभियानों का प्रतीक था। यह ट्रम्प की शक्ति-प्रतीकों के प्रति fascination को भुनाने का तरीका था।
ईरान की ओर अमेरिका को धकेलना
ट्रम्प ने ईरान में “वेनेज़ुएला-प्रकार” शासन परिवर्तन की कल्पना की — शीर्ष नेता को हटाकर एक भयभीत अधीनस्थ को स्थापित करना। सैन्य अधिकारियों की चेतावनियों के बावजूद, उन्होंने इज़राइल की त्वरित जीत वाली कथा को स्वीकार कर लिया।
संस्थागत नियंत्रण का पतन
पहले कार्यकाल के विपरीत, दूसरे कार्यकाल में ट्रम्प के पास संस्थागत रोकथाम नहीं थी। उनके चारों ओर केवल चापलूस और धनी प्रशंसक थे, जिन्होंने ईरान पर सैन्य कार्रवाई को प्रोत्साहित किया।
लोकतंत्र के लिए सबक
पुस्तक का निष्कर्ष है कि मज़बूत नेता महत्वपूर्ण हैं, लेकिन मज़बूत संस्थाएँ और संतुलन उससे भी अधिक आवश्यक हैं। जब राष्ट्रीय नीति एक व्यक्ति के अहंकार को प्रतिबिंबित करने लगती है, तो लोकतंत्र व्यक्तित्व-आधारित शासन में बदल जाता है — और इतिहास ने बार-बार दिखाया है कि यह मार्ग खतरनाक है।
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