. क्या तेल के लिए टकराएगी दुनिया की महाशक्तियां?....
21वीं
सदी में 'एनर्जी वॉर': तेल, गैस और महाशक्तियों के बीच बदलता संघर्ष
भूमिका:
ऊर्जा—वैश्विक सत्ता का नया केंद्र
इतिहास
गवाह है कि साम्राज्यों
का उदय और पतन
अक्सर संसाधनों के नियंत्रण पर
टिका रहा है। औद्योगिक
क्रांति के बाद से
'तेल' (Oil) वैश्विक अर्थव्यवस्था का रक्त बन
गया है। आज के
डिजिटल और तकनीक-प्रधान
युग में भी, दुनिया
की मशीनें, परिवहन और सैन्य तंत्र
तेल और गैस पर
ही निर्भर हैं। हालांकि दुनिया
'रिन्यूएबल एनर्जी' (नवीकरणीय ऊर्जा) की ओर बढ़
रही है, लेकिन वर्तमान
भू-राजनीतिक परिदृश्य यह स्पष्ट करता
है कि तेल के
लिए संघर्ष समाप्त नहीं हुआ है,
बल्कि उसने एक नया
और अधिक जटिल रूप
धारण कर लिया है।
1. क्या
तेल के लिए टकराएंगी महाशक्तियां?
आज के दौर में
अमेरिका, रूस और चीन
जैसी महाशक्तियों के बीच एक
पूर्ण 'विश्व युद्ध' की संभावना बहुत
कम है। इसका मुख्य
कारण 'परमाणु निवारण' (Nuclear Deterrence)
और आर्थिक अंतर्निर्भरता है। यदि तेल
के लिए ये देश
सीधे टकराते हैं, तो वैश्विक
आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) पूरी तरह ध्वस्त
हो जाएगी, जिससे विजेता को भी भारी
आर्थिक नुकसान होगा।
हालांकि,
सीधी सैन्य भिड़ंत न होने का
अर्थ यह कतई नहीं
है कि शांति बनी
रहेगी। महाशक्तियां अब 'ग्रे ज़ोन वारफेयर' का सहारा ले
रही हैं। इसमें वेनेज़ुएला
जैसे देशों में 'शासन परिवर्तन'
(Regime Change) की कोशिशें, मध्य-पूर्व में
विद्रोहियों को हथियार देना
और समुद्री मार्गों पर नियंत्रण जैसे
हथकंडे शामिल हैं।
2. वेनेज़ुएला:
आर्थिक और कूटनीतिक शतरंज का मैदान
वेनेज़ुएला
के पास दुनिया का
सबसे बड़ा तेल भंडार
है, फिर भी वह
आर्थिक बदहाली से जूझ रहा
है। यहाँ का संकट
इस बात का सटीक
उदाहरण है कि कैसे
तेल संसाधन किसी देश के
लिए 'वरदान' के बजाय 'अभिशाप'
बन जाते हैं।
- अमेरिका यहाँ लोकतंत्र के नाम पर आर्थिक प्रतिबंधों का उपयोग करता है ताकि मौजूदा सरकार पर दबाव बनाया जा सके।
- रूस और चीन यहाँ भारी निवेश और ऋण के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। यह संघर्ष सीधे युद्ध के बजाय 'सॉफ्ट वार' और 'इकोनॉमिक ब्लॉकेड' (आर्थिक नाकेबंदी) का है। अमेरिका का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि वेनेज़ुएला का तेल रूसी या चीनी प्रभाव से मुक्त रहे।
3. रूस-यूक्रेन युद्ध और ऊर्जा हथियार
21वीं
सदी का सबसे बड़ा
ऊर्जा संघर्ष रूस-यूक्रेन युद्ध
के रूप में सामने
आया है। यहाँ संघर्ष
केवल ज़मीन के लिए नहीं,
बल्कि यूरोप के ऊर्जा बाज़ार पर नियंत्रण के
लिए भी है।
- ऊर्जा का हथियार के रूप में उपयोग: रूस ने नॉर्ड स्ट्रीम पाइपलाइनों के ज़रिए यूरोप को मिलने वाली गैस की आपूर्ति रोककर इसे एक हथियार (Energy Weapon) के रूप में इस्तेमाल किया।
- अमेरिका का लाभ: इस संकट ने अमेरिका को यूरोप के लिए एक प्रमुख 'लिक्विफाइड नेचुरल गैस' (LNG) निर्यातक के रूप में उभरने का मौका दिया।
- प्रॉक्सी युद्ध: यूक्रेन को पश्चिमी देशों से मिलने वाली सैन्य मदद और रूस पर लगाए गए हज़ारों प्रतिबंध इस आधुनिक "एनर्जी वॉर" के ही हिस्से हैं।
4. आधुनिक
ऊर्जा युद्ध के नए हथियार
आज के युग में
'टैंकों' और 'मिसाइलों' से
ज़्यादा प्रभावी निम्नलिखित तरीके साबित हो रहे हैं:
- आर्थिक प्रतिबंध (Economic
Sanctions): ईरान
और रूस पर लगे प्रतिबंधों ने उनकी तेल अर्थव्यवस्था को चोट पहुँचाई है। यह बिना गोली चलाए किसी देश को घुटनों पर लाने का तरीका है।
- साइबर ऑपरेशन: दुश्मन देश के तेल रिफाइनरियों या बिजली ग्रिडों पर साइबर हमले करना अब युद्ध का नया सामान्य है।
- प्राइवेट मिलिशिया: रूस का 'वैगनर ग्रुप' जैसे निजी सैन्य संगठन अफ्रीका और मध्य-पूर्व के तेल संपन्न क्षेत्रों में सक्रिय रहते हैं, जिससे रूसी सरकार सीधी ज़िम्मेदारी से बच जाती है।
- समुद्री नाकेबंदी: दक्षिण चीन सागर और 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' जैसे समुद्री रास्तों पर नौसैनिक दबाव बनाकर महाशक्तियां ऊर्जा आपूर्ति को नियंत्रित करने की कोशिश करती हैं।
5. मध्य-पूर्व: संघर्ष का पारंपरिक केंद्र
ईराक,
लीबिया और सीरिया के
संघर्षों के पीछे तेल
एक प्रमुख कारक रहा है।
मध्य-पूर्व में अमेरिका और
ईरान के बीच की
प्रतिद्वंद्विता अक्सर तेल की कीमतों
और वैश्विक बाज़ार को प्रभावित करती
है। "प्रॉक्सी कॉन्फ्लिक्ट" (जैसे यमन में
हूती विद्रोही बनाम सऊदी अरब)
दरअसल ऊर्जा स्रोतों और रणनीतिक मार्गों
पर नियंत्रण की ही लड़ाई
है।
6. भविष्य
की ओर: तेल से 'क्रिटिकल मिनरल्स' तक
जैसे-जैसे दुनिया क्लीन
एनर्जी की ओर बढ़
रही है, संघर्ष का
केंद्र तेल से हटकर
लिथियम, कोबाल्ट और तांबे जैसे खनिजों की
ओर शिफ्ट हो रहा है।
इलेक्ट्रिक वाहनों और बैटरियों के
लिए इन खनिजों पर
नियंत्रण पाना भविष्य का
"नया तेल युद्ध" होगा।
चीन ने पहले ही
इन संसाधनों पर अपनी पकड़
मज़बूत कर ली है,
जिससे पश्चिमी देशों में चिंता बढ़
गई है।
निष्कर्ष
21वीं
सदी में ऊर्जा युद्ध
समाप्त नहीं हुए हैं,
बल्कि वे और अधिक
परमाणु-सक्षम और अदृश्य हो गए हैं।
महाशक्तियां अब सीधे युद्ध
के मैदान में उतरने के
बजाय प्रतिबंधों, प्रॉक्सी गुटों और आर्थिक दबावों
के माध्यम से अपनी श्रेष्ठता
सिद्ध कर रही हैं।
तेल और गैस केवल
ईंधन नहीं हैं, बल्कि
वे भू-राजनीतिक शतरंज
की गोटियां हैं।
जब तक दुनिया ऊर्जा
के लिए पूरी तरह
से स्वतंत्र और विकेंद्रीकृत स्रोतों
(जैसे सौर और पवन)
पर निर्भर नहीं हो जाती,
तब तक तेल के
इर्द-गिर्द घूमने वाले ये "एनर्जी
वॉर" मानवता के लिए खतरा
बने रहेंगे। यह आवश्यक है
कि वैश्विक समुदाय संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण
और 'ऊर्जा कूटनीति' (Energy Diplomacy) को प्राथमिकता दे
ताकि क्षेत्रीय संघर्षों को वैश्विक तबाही
बनने से रोका जा
सके।
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